मांगी रोटी, मिली बंदुक से गोली
१. तुम कहते थे हमें राजनीति और नेताओं से क्या लेना देना ? विदेश चले जायेंगे, अपना कमाकर खायेंगे। भाँड में गई राजनीति। देख लो, वही राजनीति और नेता ऐसी मुसिबत में आज अपने घर तक भी वापस आने नही दे रहे हैं, कोई पहल और इंतजाम भी नहीं कर रहे हैं ! कोई विदेश में मर रहे हैं, तो कोई सीमा तक आकर।
२. तुम कहते थे कोई जीते, हमें क्या लेना देना ? अच्छा आदमी हमको क्या देगा ? तो फिर भ्रष्टाचार हुआ, कि अस्पताल में इलाज नहीं हो रहा है, कि अच्छी स्कूल नहीं है, कि आपको रोजगारी नहीं है, कि सुरक्षा नहीं है, कि दिनदहाड़े आपके प्रियजन का अपहरण या बलात्कार हो रहा है, कि कालाबजारी हो रही है, कि आपसे खुल्लमखुल्ला घुस मांगा जा रहा है, कि आपका फसल नहीं बिका, कि आपको मेयर/सांसद और उनके लठैत मार रहे है, क्यों गिड़गिड़ना !?
३. तुम कहते थे जो हजार दो-हजार रुपया देगा उसे ही भोट दूँगा। वही जीते। और इसलिये आज जब भूखे बच्चों के लिये दो किलो राहत का चावल लेने जाते हो, तो वही मेयर/अध्यक्ष गाली देकर लात मारकार भगाते हैं, लाठी से पीटवाते हैं, पुलिस बुलाकर तुम पर गोली चलवाते हैं।
और इतना होने पर भी कुछ सीखते तो ना ? कि फिर वही भ्रष्टाचारी, वही पैसेवाले, वही लठैतवाले, को ही चुनोगे !?


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